जिनदेशना यूथ कन्वेंशन के द्वितीय दिवस पर धर्म, दर्शन और संस्कारों का अद्भुत संगम

उद्घाटन सभा में सांसद डॉ. मन्नालाल रावत का मिला सानिध्य, विद्वानों के जिनवचनों से गूंजा तेरापंथ भवन; शाश्वतधाम की बालिकाओं ने ‘चंदना की सुगंध’ नाटिका से किया भावविभोर

उदयपुर। श्री दिगम्बर जैन मुमुक्षु मंडल ट्रस्ट, उदयपुर एवं श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट, मुंबई के तत्वावधान में आयोजित नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन का द्वितीय दिवस रविवार को धर्म, दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन, जिनवाणी आराधना और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच श्रद्धा एवं उत्साह के साथ संपन्न हुआ। प्रचार प्रसार विभाग के डॉ. निलेश शास्त्री ने बताया कि नाइयों की तलाई स्थित तेरापंथ भवन में आयोजित इस सम्मेलन में प्रातःकालीन जिनेंद्र प्रक्षाल एवं पूजन-विधान से लेकर उद्घाटन सभा, विद्वानों के प्रवचन, सर्वज्ञ देव विधान, जिनेंद्र भक्ति तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक पूरे दिन आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। सम्मेलन का उद्देश्य युवाओं को जैन धर्म के सिद्धांतों, आत्मकल्याण के मार्ग तथा भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जोड़ना रहा।

ध्वजारोहण एवं उद्घाटन समारोह में विभिन्न महानुभावों का सानिध्य

द्वितीय दिवस का शुभारंभ प्रातःकाल जिनेंद्र प्रक्षाल एवं पूजन-विधान के साथ हुआ। पूजन व विधान डॉ. विराग शास्त्री, डॉ.अंकित शस्त्री व शाश्वत बालाओं ने मधुर भजनों के द्वारा संपन्न कराया। इसके पश्चात ध्वजारोहण, मंडप उद्घाटन, मंच उद्घाटन, शिविर उद्घाटन एवं चित्र अनावरण के साथ उद्घाटन सभा आयोजित हुई। समारोह में विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक महानुभावों की सहभागिता रही।

ध्वजारोहण का सौभाग्य संयम एवं श्याम जी सिंघवी को प्राप्त हुआ। मंडप उद्घाटन विनोद सिंघवी चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से सपना सिंघवी के हस्ते संपन्न हुआ। मंच उद्घाटन चेन्नई के आत्मदीप भायाणी ने किया, जबकि शिविर उद्घाटन विनय-विशाखा बरछा के हस्ते हुआ। चित्र अनावरण मुंबई के श्री भरत अमरावत, अहमदाबाद के श्री लोकेंद्र भाई तथा मुंबई के श्री सतीश भाई मेहता के हस्ते संपन्न हुआ।

उद्घाटन सभा के विशेष अवसर पर उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत का सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कचरुलाल मेहता ने की। मुख्य अतिथि के रूप में श्याम एस. सिंघवी तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में राजेन्द्र भोरावत उपस्थित रहे। अतिथियों में हँसमुख गंगावत, नरेंद्र दलावत, ललित किकावत, भावेश कालिका, सुरेश अखावत तथा समकित जैन सहित अन्य गणमान्यजन शामिल रहे।

पांच समवाय से अनेकांतवाद तक—विद्वानों ने सरल शैली में समझाए जैन दर्शन के सिद्धांत

सम्मेलन के प्रातःकालीन जिनवचन प्रवाह में विद्वानों ने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा, सहज उदाहरणों और व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।

प्रथम प्रवचन में खैरागढ़ के पं. अभय जी शास्त्री ने पांच समवाय के विषय को केंद्र में रखते हुए धर्म के सिद्धांतों की व्याख्या की। उन्होंने सरल शैली और सरस उदाहरणों के माध्यम से विषय को समझने योग्य बनाया। उनके प्रवचन में जैन दर्शन के सिद्धांतों को जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर समझने का अवसर मिला।

द्वितीय प्रवचन में करेली के मंगलार्थी अनुभव जी ने जैन धर्म के प्रसिद्ध सिद्धांत अनेकांतवाद एवं स्याद्वाद को अत्यंत सरल और सहज शैली में प्रस्तुत किया। अनेकांतवाद की दृष्टि व्यक्ति को किसी भी विषय के विभिन्न पक्षों को समझने, विचारों में संतुलन रखने तथा परस्पर मतभेदों के बीच भी समन्वय की भावना विकसित करने की प्रेरणा देती है। स्याद्वाद के माध्यम से कथन में अपेक्षा, दृष्टिकोण और विचार की मर्यादा को समझने का संदेश मिला। युवाओं के लिए ये सिद्धांत वैचारिक उदारता, सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति विकसित करने में विशेष उपयोगी हैं।

दोपहर के जिनवचन प्रवाह में नागपुर के पं. विपिन जी शास्त्री ने मूलाचार विषय पर विस्तृत धार्मिक व्याख्यान दिया। उन्होंने इस महत्वपूर्ण ग्रंथ के माध्यम से जैन साधना, आचार-विचार और संयमप्रधान जीवन की महत्ता को प्रस्तुत किया। प्रवचन ने धर्म को केवल श्रवण का विषय न मानकर आचरण में उतारने की प्रेरणा दी।

सर्वज्ञ देव विधान में श्रद्धा एवं भक्ति का वातावरण

नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन के अंतर्गत 18 अक्टूबर को दिव्यदेशना महिला मंडल की आमंत्रणा से सर्वज्ञ देव विधान का आयोजन भी हुआ। विधान में महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता करते हुए जिनेंद्र भगवान के प्रति अपनी भक्ति एवं समर्पण व्यक्त किया।

विधान में मुख्य कलश का सौभाग्य श्रीमती डॉली एवं प्रतीक जी भोरावत को प्राप्त हुआ।

कलश विराजमानकर्ता के रूप में श्रीमती मोना-विवेक जैन, कोटा; श्रीमती साधना-सुरेश जी अखावत; श्रीमती प्रमिला-संजय जी भदावत तथा श्रीमती आशा-ऋषभ जी सिंघवी ने सहभागिता की।

जिनवाणी विराजमानकर्ता के रूप में श्रीमती ज्योति-कुलदीप जी फान्दोत, श्रीमती किंजल-आयुष जी दलावत, श्रीमती भारती-मनोहर जी भोरावत तथा श्रीमती सुमित्रा-कान्तिलाल जी ढोलिया को सौभाग्य प्राप्त हुआ।

विधान के माध्यम से जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, सर्वज्ञ परमात्मा के गुणों का स्मरण तथा आत्मकल्याण की भावना को अभिव्यक्ति मिली। महिला मंडल की सहभागिता ने धार्मिक आयोजनों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका और संस्कारों के संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित किया।

स्थानीय विद्वत वर्ग के समागम से समृद्ध हुआ जिनवचन प्रवाह

सम्मेलन में उदयपुर के स्थानीय विद्वत वर्ग का भी उल्लेखनीय समागम रहा। इस अवसर पर पं. संदीप मेहता, पं. अमित शास्त्री, पं. गजेन्द्र शास्त्री, डॉ. अंकित शास्त्री, डॉ. तपिश शास्त्री, डॉ. निलेश शास्त्री, पं. अर्पित शास्त्री, पं. राहुल शास्त्री, पं. दीपक शास्त्री, पं. प्रशांत शास्त्री, पं. सम्मेद शास्त्री, पं. भव्य शास्त्री तथा पं. संयम जैन की उपस्थिति रही।

इसके साथ ही विदुषी भाविका शास्त्री, विदुषी प्रज्ञा शास्त्री, विदुषी मुस्कान शास्त्री, विदुषी श्रुति शास्त्री तथा विदुषी अदिति शास्त्री सहित विदुषी वर्ग ने भी सहभागिता की।

विद्वानों एवं विदुषियों की उपस्थिति ने सम्मेलन के बौद्धिक और आध्यात्मिक वातावरण को समृद्ध बनाया। ऐसे आयोजनों में विभिन्न विद्वानों का एकत्रित होना जैन आगम, दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन के अध्ययन तथा भावी पीढ़ी तक धर्म की प्रामाणिक शिक्षाओं को पहुंचाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

‘चंदना की सुगंध’ नाटिका ने जीवंत किया चंदनबाला का त्याग और समर्पण

सायंकाल संस्कारतीर्थ शाश्वतधाम की बालिकाओं द्वारा जैन धर्म की महान सती चंदनबाला के जीवन पर आधारित ‘चंदना की सुगंध’ नाटिका का भावपूर्ण मंचन किया गया। प्रस्तुति के माध्यम से चंदनबाला के जीवन की प्रेरणादायी घटनाओं, उनके त्याग, धैर्य, सहनशीलता और धर्म के प्रति अटूट समर्पण को कलात्मक रूप में अभिव्यक्त किया गया।

चंदनबाला का जीवन विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मबल बनाए रखने, संयम और सद्भाव की भावना को जीवित रखने तथा धर्म के प्रति दृढ़ निष्ठा का संदेश देता है। भगवान महावीर के आहार-विहार से जुड़ा उनका प्रसंग जैन परंपरा में विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। नाटिका के माध्यम से बालिकाओं ने इस प्रेरक प्रसंग को मंच पर साकार करते हुए उपस्थित जनसमुदाय को भावविभोर किया।

प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में त्याग, करुणा, धैर्य, विनम्रता और आत्मसम्मान जैसे गुणों को विकसित करना भी धर्माचरण का महत्वपूर्ण अंग है। बालिकाओं की इस प्रस्तुति ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक इतिहास और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की सार्थक पहल प्रस्तुत की।

भक्ति, जिनवाणी और आत्मचिंतन से परिपूर्ण रहा दिन

द्वितीय दिवस की निर्धारित कार्यक्रम रूपरेखा में सायंकाल नुक्कड़ नाटिका, जिनेंद्र भक्ति एवं आनंद यात्रा तथा रात्रिकालीन जिनवचन प्रवाह और शाश्वतधाम की बालिकाओं की नाटिका के कार्यक्रम भी सम्मिलित रहे। इस प्रकार सम्मेलन में धर्मचर्चा, शास्त्रीय चिंतन, सामूहिक भक्ति और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का समन्वय देखने को मिला।

जिनदेशना यूथ कन्वेंशन युवाओं को जैन दर्शन की मूल भावना से जोड़ने, जिनवाणी के प्रति अनुराग बढ़ाने और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को व्यवहार में अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। सम्मेलन में प्रस्तुत पांच समवाय, अनेकांतवाद, स्याद्वाद एवं मूलाचार जैसे विषयों ने धर्म को समझने के साथ-साथ जीवन में उतारने की प्रेरणा दी।

समग्र रूप से द्वितीय दिवस धर्म, दर्शन, विद्वत्ता, महिला सहभागिता, युवा चेतना और सांस्कृतिक संस्कारों के सुंदर समन्वय का साक्षी बना। तेरापंथ भवन में आयोजित कार्यक्रमों ने जैन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा को जनमानस तक पहुंचाने तथा भावी पीढ़ी को आत्मकल्याण, संयम और सदाचार के मार्ग पर प्रेरित करने का संदेश दिया।

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