सियासी तल्खी और अपनों के ‘धोखे’ का दर्द, बेनीवाल ने बाड़मेर की धरा से भरी हुंकार, दिल्ली से जयपुर तक साधा निशाना

बाड़मेर। राजस्थान की राजनीति के बेबाक और मुखर चेहरे, नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल जब मंगलवार को बाड़मेर के दौरे पर थे, तो उनके शब्दों में न केवल सत्ता के प्रति तीखा आक्रोश था, बल्कि अपनों के साथ छोड़ने की एक गहरी टीस भी साफ़ झलक रही थी। बायतु से लेकर भियाड़ तक हुए भव्य स्वागत के बीच आरएलपी सुप्रीमो ने एक ऐसा बयान दिया जिसने दिल्ली की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने दोटूक कहा कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव परिणाम देश का भविष्य तय करेंगे और यदि बंगाल में टीएमसी की जीत होती है, तो केंद्र की दिल्ली सरकार की उल्टी गिनती वहीं से शुरू हो जाएगी।

बेनीवाल का सबसे कड़ा प्रहार राजस्थान की मौजूदा सरकार और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर रहा। उन्होंने बेहद तल्ख अंदाज में कहा कि यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि सत्ता की कमान ऐसे हाथों में है जिन्हें ‘सीएम’ की स्पेलिंग तक का इल्म नहीं है। उन्होंने व्यवस्था से अपनी इस कदर नाराजगी जाहिर की कि यहां तक कह दिया कि उन्हें राजस्थान का सांसद होने पर शर्म महसूस होती है और कई बार मन इस्तीफा देने को करता है।

सत्ता के साथ-साथ उनके निशाने पर वे ‘अपने’ भी रहे जिन्होंने मुश्किल वक्त में पार्टी का साथ छोड़ा। बाड़मेर सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल का नाम लिए बिना उन्होंने विश्वासघात का जिक्र करते हुए कहा कि जिन्हें बाड़मेर की जिम्मेदारी सौंपी थी, उन्होंने ही पार्टी के हितों का सौदा कर लिया। उन्होंने भावुक होते हुए याद दिलाया कि कैसे 2018 में जनता के मान-सम्मान से आरएलपी खड़ी हुई थी, लेकिन इस बार अपनों की चूक और स्वार्थ की आंधी ने संघर्ष को प्रभावित किया है।

कांग्रेस और बीजेपी को एक ही सिक्के के दो पहलू बताते हुए बेनीवाल ने आरोप लगाया कि दोनों दलों के नेता भीतरखाने साठगांठ कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने बाड़मेर और बालोतरा के विकास की अनदेखी पर भी गहरा दुख व्यक्त किया। बेनीवाल ने एक विजन रखते हुए कहा कि अगर पुराने नेताओं की नीयत साफ होती और यहां समय पर नहरें आतीं, तो आज बाड़मेर और नागौर का युवा दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के बजाय पंजाब की तर्ज पर विदेशों में उच्च शिक्षा ले रहा होता। बेनीवाल का यह दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता को तीसरी ताकत के महत्व को समझाने और व्यवस्था परिवर्तन की एक मार्मिक अपील बनकर उभरा।

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