उदयपुर। नगर निगम चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद शहर की राजनीति में अब हार-जीत के आंकड़ों से आगे जाकर चुनावी रणनीति और संगठन की भूमिका पर चर्चा शुरू हो गई है। 80 वार्डों वाले उदयपुर नगर निगम में भाजपा ने 53 वार्डों में जीत दर्ज कर लगातार सातवीं बार बोर्ड बनाने का रास्ता साफ किया, जबकि कांग्रेस 23 सीटों पर सिमट गई। एक वार्ड में माकपा और तीन वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की।
चुनाव परिणामों को देखें तो भाजपा की जीत केवल बड़े अंतर वाली सीटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई बेहद करीबी मुकाबलों में भी पार्टी ने अंतिम समय तक अपनी पकड़ बनाए रखी। भाजपा ने चुनाव को महज वार्ड स्तर का मुकाबला न मानते हुए संगठन के माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर दिया। विधानसभा चुनाव में मजबूत दावेदार रहे सात चेहरों को मैदान में उतारने के साथ ही बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया गया। इसके अलावा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो ने भी चुनावी माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
भाजपा की रणनीति का असर उन वार्डों में भी दिखाई दिया, जहां मुकाबला बेहद कांटे का था। वार्ड नंबर 25 में भाजपा को महज 32 वोटों से और वार्ड नंबर 75 में 51 वोटों से जीत मिली। इन नतीजों से साफ है कि मामूली अंतर वाले मुकाबलों में भी संगठन ने आखिरी वोट तक अपनी ताकत झोंकी।
कांग्रेस के सामने संगठन और रणनीति की चुनौती
वहीं कांग्रेस के लिए चुनाव परिणाम कई सवाल खड़े कर रहे हैं। पार्टी के प्रदेश स्तर के बड़े नेताओं की अपेक्षाकृत कम सक्रियता, टिकट वितरण को लेकर नाराजगी और चुनाव के अंतिम दौर में प्रत्याशियों को बदलने जैसी घटनाओं का असर कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई दिया।
करीब 20 वार्डों में टिकट को लेकर सामने आए विरोध ने कांग्रेस संगठन के भीतर की खींचतान को उजागर किया। कई जगहों पर प्रत्याशी चयन को लेकर कार्यकर्ताओं में असंतोष रहा, जिसका सीधा असर चुनावी अभियान पर पड़ा।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता उन पांच वार्डों की रही, जहां उसके प्रत्याशी 100 से भी कम वोटों के अंतर से चुनाव हार गए। इन सीटों पर परिणाम बेहद करीबी रहे और माना जा रहा है कि यदि संगठन की ओर से अतिरिक्त ताकत लगाई जाती, बड़े नेताओं की मौजूदगी रहती और कार्यकर्ता पूरी तरह एकजुट होकर मैदान में उतरते, तो तस्वीर बदल सकती थी।
हार से ज्यादा चुभ रही हैं करीबी सीटें
कांग्रेस के लिए इन करीबी हारों की टीस इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि कुछ सीटों पर जीत उसके बेहद करीब थी। चुनाव परिणाम के बाद अब पार्टी के भीतर यह मंथन शुरू होना स्वाभाविक है कि आखिर उन सीटों पर अंतिम समय में संगठन अपनी ताकत क्यों नहीं जुटा पाया।
वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव संगठन की जमीनी ताकत और बूथ स्तर के माइक्रो मैनेजमेंट की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है। लगातार सातवीं बार बोर्ड बनाने की स्थिति में पहुंची भाजपा ने वार्ड स्तर से लेकर बूथ स्तर तक जिस तरह चुनावी रणनीति को आगे बढ़ाया, उसका असर परिणामों में साफ नजर आया।
अब चुनाव परिणाम के बाद उदयपुर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बड़े नेताओं की समय पर सक्रियता, टिकट वितरण में बेहतर तालमेल और कार्यकर्ताओं की एकजुटता से उन करीबी मुकाबलों का परिणाम बदला जा सकता था?
फिलहाल परिणाम भाजपा के पक्ष में हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल हार का आंकड़ा नहीं बल्कि संगठन की कमजोरियों और चूकी हुई संभावनाओं पर आत्ममंथन का मौका भी है। आने वाले दिनों में पार्टी इन परिणामों की समीक्षा कर अपनी रणनीति में क्या बदलाव करती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
