राजस्थान में ‘ब्यूरोक्रेसी’ आउट ऑफ कंट्रोल! मंत्रियों को अंगूठा दिखा रहे अफसर, विधायकों ने खोला मोर्चा; क्या मुख्यमंत्री करेंगे साहबों का ‘गेम ओवर’?

जयपुर। राजस्थान में सुशासन के दावों के बीच नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) और जनप्रतिनिधियों के बीच छिड़ा विवाद अब एक बड़े प्रशासनिक संकट का रूप लेता जा रहा है। प्रदेश में सत्ताधारी दल के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के बीच अफसरों के प्रति पनपा आक्रोश अब केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरेआम सड़कों और मंचों पर ‘फटकार’ के रूप में नजर आने लगा है। हालात ये हैं कि जिला कलेक्टर और एसपी स्तर के अधिकारी अपने ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को तवज्जो देना तो दूर, उनकी वाजिब बातों को भी नियमों की फाइलों में उलझा रहे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के पास पहुँच रही शिकायतों की लंबी फेहरिस्त इस बात की गवाह है कि प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी फिलहाल बेकाबू मोड में है, जिसका सीधा असर सरकार की कार्यप्रणाली और जनता के विकास कार्यों पर पड़ रहा है।

प्रशासनिक गलियारों में मचे इस घमासान की सबसे ताजा और चर्चित तस्वीर सीकर से आई, जहाँ वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने कलेक्टर मुकुल शर्मा को भ्रष्टाचारियों का संरक्षक बताते हुए सरेआम फटकार लगा दी। मंत्री की नाराजगी इस कदर हावी थी कि उन्होंने कलेक्टर को बीच में बोलने पर टोकते हुए कार्यक्रम छोड़कर जाने तक की चेतावनी दे दी। ऐसा ही कुछ प्रतापगढ़ में देखने को मिला, जहाँ कलेक्टर डॉ. अंजली राजोरिया और उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत के बीच का विवाद अब पत्रों के जरिए ‘लेटर वॉर’ में तब्दील हो चुका है। सांसद ने जहाँ कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, वहीं कलेक्टर ने भी पलटवार करते हुए मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सांसद पर भेदभावपूर्ण विकास कार्यों का दबाव बनाने का गंभीर आरोप मढ़ दिया। यह पहली बार है जब कोई कलेक्टर किसी सांसद के खिलाफ इस तरह मुखर होकर सामने आया है।

श्रीगंगानगर में भी ‘खाकी और खादी’ का टकराव मंच पर दिखाई दिया, जहाँ भाजपा विधायक जयदीप बिहानी ने प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए कलेक्टर और एडीएम की क्लास लगा दी और एडीएम को कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया। राजधानी जयपुर में सांसद मंजू शर्मा का पारा भी सातवें आसमान पर रहा, जब उन्होंने नगर निगम के अधिकारियों को जनता के काम न करने पर खरी-खोटी सुनाते हुए पूछा कि “काम नहीं करना तो तनख्वाह क्यों लेते हो?” इन तमाम घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय का पुल पूरी तरह टूट चुका है। नेता जहाँ जनता के प्रति अपनी जवाबदेही का हवाला देकर काम कराना चाहते हैं, वहीं अधिकारी अपनी स्वायत्तता और नियमों की दुहाई देकर टकराव की स्थिति पैदा कर रहे हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों पर पांच साल में जनता के बीच जाने का दबाव होता है, जबकि अफसरों की कार्यशैली अक्सर ढुलमुल रहती है। यही कारण है कि अपनी ही सरकार होने के बावजूद विधायक और सांसद खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। सचिवालय सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री स्तर पर इन सभी विवादों की फाइलें तैयार हो चुकी हैं। माना जा रहा है कि नए साल में सरकार एक बहुत बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करने वाली है, जिसमें उन तमाम कलेक्टरों और पुलिस कप्तानों को लूप लाइन में भेजा जाएगा जिनके खिलाफ जनप्रतिनिधियों ने मोर्चा खोल रखा है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री इस ‘ब्यूरोक्रेटिक ईगो’ को शांत करने के लिए क्या कड़े कदम उठाते हैं।

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