उदयपुर। नगर निगम चुनाव 2026 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, शहर की सियासत में चुनावी सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। बीजेपी, कांग्रेस और निर्दलीय दावेदार अपने-अपने स्तर पर चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। इसी बीच बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले वार्ड 3, जो परिसीमन से पहले वार्ड 1 के नाम से जाना जाता था, में पार्टी के भीतर से ही बगावती सुर सामने आए हैं।
वार्ड 3 के लंबे समय से बीजेपी के लिए बूथ स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर पैराशूट उम्मीदवार को लेकर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। कार्यकर्ताओं ने चुनाव कोर कमिटी के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराने के लिए रैली निकाली। बड़ी संख्या में कार्यकर्ता देवाली पाल पर एकत्रित हुए और वहां से रैली के रूप में पटेल सर्किल स्थित बीजेपी कार्यालय पहुंचे।
बीजेपी कार्यालय पहुंचकर कार्यकर्ताओं ने पार्टी के जिला अध्यक्ष *गजपाल सिंह, *प्रमोद सामर और पूर्व उपमहापौर पारस सिंघवी के सामने अपनी बात रखी। कार्यकर्ताओं ने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी जिसे चाहे टिकट दे, लेकिन उम्मीदवार वार्ड 3 का स्थानीय निवासी और वार्ड की जमीन से जुड़ा हुआ व्यक्ति होना चाहिए।
कार्यकर्ताओं का कहना था कि वे पिछले कई दशकों से पार्टी के लिए बूथ स्तर पर लगातार काम करते आए हैं। इनमें ऐसे कार्यकर्ता भी शामिल रहे हैं, जिन्होंने करीब 40 वर्षों से पार्टी की विचारधारा और संगठन के लिए अपनी भूमिका निभाई है। ऐसे में चुनाव के समय बाहर से या अचानक सामने आने वाले उम्मीदवार को प्राथमिकता दिए जाने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी स्वाभाविक है।
कार्यकर्ताओं ने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए सवाल किया—“क्या हमारी मान-प्रतिष्ठा नहीं है? क्या हम सिर्फ जाजम उठाने और बिछाने के लिए हैं?” उनका कहना था कि जब पार्टी को बूथ स्तर पर मजबूत करने, मतदाताओं तक पहुंचने और संगठन खड़ा करने की जरूरत होती है, तब यही कार्यकर्ता सबसे आगे रहते हैं। लेकिन जब टिकट वितरण की बारी आती है तो वर्षों से सक्रिय कार्यकर्ताओं की अनदेखी क्यों की जाती है?
कार्यकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी नाराजगी पार्टी से नहीं, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और पैराशूट उम्मीदवार की संभावित दावेदारी से है। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी उनकी मांग को स्वीकार करती है और वार्ड से किसी जमीनी कार्यकर्ता को टिकट देती है तो वे पूरी ताकत से पार्टी के साथ खड़े रहेंगे।
खास बात यह रही कि कार्यकर्ताओं ने फिलहाल निर्दलीय प्रत्याशी उतारने से इनकार किया है। हालांकि उन्होंने चेतावनी जरूर दी कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो वे चुनावी गतिविधियों से पूरी तरह निष्क्रिय रहेंगे और पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगे।
वार्ड 3 के कार्यकर्ताओं का यह खुला विरोध बीजेपी के लिए चुनाव से पहले एक अहम संकेत माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे स्थानीय कार्यकर्ताओं की मांग को कितनी गंभीरता से लेता है और टिकट वितरण में जमीनी कार्यकर्ता बनाम पैराशूट उम्मीदवार की इस बहस का क्या समाधान निकालता है।
फिलहाल वार्ड 3 में उठे ये बगावती सुर आने वाले दिनों में बीजेपी की चुनावी रणनीति के लिए कितना बड़ा असर डालते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

