मेवाड़… जहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि परंपराओं और रिश्तों में आज भी जिंदा है। जहां राजपरिवार और अपने आत्मीय एवं सहयोगी परिवारों के बीच सुख-दुःख में सहभागी होने की परंपरा सदियों से निभाई जाती रही है। उदयपुर में मेवाड़ की ऐसी ही एक 155 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक परंपरा एक बार फिर जीवंत होती दिखाई दी। मेवाड़ के 77वें श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ उदयपुर की बड़लिया हवेली पहुंचे। यहां स्वर्गीय राव बख्तावर सिंह जी के प्रपौत्र राव गजेन्द्र सिंह जी की धर्मपत्नी के देहावसान के बाद श्रीजी हुजूर मोखाण पधारे। उन्होंने राव गजेन्द्र सिंह जी, उनके सुपुत्र राव अक्षय सिंह और परिवार के अन्य सदस्यों से मुलाकात कर अपनी आत्मीय संवेदनाएं व्यक्त कीं। दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिवार को इस दुःख की घड़ी में धैर्य बंधाया। लेकिन इस पूरे आयोजन की सबसे खास बात रही—मेवाड़ की पुरानी परंपराओं का उसी गरिमा और आत्मीयता के साथ निर्वहन। मेवाड़ के इतिहास में राजपरिवार और कविराव परिवार के संबंधों का विशेष स्थान रहा है। ऐतिहासिक बहियों में भी इस हवेली पर मेवाड़ के महाराणाओं के मोखाण पधारने के उल्लेख मिलते हैं। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 13 जुलाई 1871 को मेवाड़ के 71वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा शम्भूसिंह जी कवि राव बख्तावर सिंह की माताजी के देहावसान पर बड़लिया हवेली मोखाण पधारे थे। इसके बाद 22 अप्रैल 1894 को मेवाड़ के 73वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा फतहसिंह जी कवि राव बख्तावर सिंह के देहावसान के उपरांत उनके पुत्र गोविन्द सिंह के मोखाण पधारे। वहीं वर्ष 1964 में मेवाड़ के 75वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा भगवतसिंह मेवाड़ ने कवि राव बख्तावर सिंह के पौत्र कवि राव मोहन सिंह के देहावसान पर हवेली पहुंचकर अपनी आत्मीयता प्रकट की थी। यानी करीब 155 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा की कड़ी अब वर्ष 2026 में भी आगे बढ़ी। डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के मोखाण के दौरान पान बीड़ा देने की परंपरा भी निभाई गई। इसके साथ ही रंग बदलाई दस्तूर का भी निर्वहन हुआ। राव नरेन्द्र सिंह को रंग की पाग पहनाई गई। शास्त्रीजी ने राव गजेन्द्र सिंह, राव महेंद्र सिंह और राव अक्षय सिंह को रंग की पाग पहनाई। श्रीजी हुजूर की ओर से राव परिवार के सदस्यों को सरोपाव भी प्रदान किए गए। इस अवसर पर बड़लिया हवेली परिवार के दामाद डॉ. उग्रसेन राव ने श्रीजी हुजूर को भूपाल भूषण, प्रताप यश चंद्रोदय और राजस्थान राव छात्रावास का इतिहास पुस्तकें भेंट कीं। इस पूरे अवसर पर राव परिवार के सदस्यों के साथ क्षेत्रवासी और प्रबुद्धजन भी मौजूद रहे। दरअसल, मेवाड़ की पहचान केवल उसके किलों, महलों और इतिहास से नहीं है… मेवाड़ की पहचान उन रिश्तों और परंपराओं से भी है, जो पीढ़ियों से एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े रहने का संदेश देती हैं। बड़लिया हवेली पर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का मोखाण पधारना भी इसी परंपरा की निरंतरता है। 155 साल पहले जिस परंपरा को मेवाड़ के महाराणाओं ने निभाया था, वही परंपरा आज भी उसी आत्मीयता के साथ आगे बढ़ रही है। यही मेवाड़ की विरासत है.. यही मेवाड़ के संस्कार हैं… और यही उन रिश्तों की ताकत है, जिन्हें वक्त भी बदल नहीं पाया।

