अशोक नगर जैन मंदिर में पार्श्वनाथ भगवान के निर्वाण कल्याणक पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

– क्षमा धारण करें, बैर-विरोध से दूर रहें : मुनि श्री सुहित सागर

उदयपुर, 19 अगस्त। उदासीन आश्रम, अशोक नगर स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में मुनि अरहसागर महाराज एवं मुनि  सुहित सागर महाराज के सान्निध्य में भगवान पार्श्वनाथ के महा मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा से हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्ज्वलित किया। मुनिश्री के पाद-प्रक्षालन एवं श्रीफल भेंट कर श्रद्धालुओं ने आशीर्वाद प्राप्त किया। आहारचर्या भी सानंद संपन्न हुई।

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष महेंद्र टाया ने बताया कि भगवान पार्श्वनाथ की प्रथम शांतिधारा करने का सौभाग्य महेंद्र जैन महाराष्ट्र को प्राप्त हुआ, जबकि द्वितीय शांतिधारा प्रकाश जी अखावत परिवार को प्राप्त हुई। भगवान पार्श्वनाथ के समक्ष निर्वाण लड्डू चढ़ाने का सौभाग्य परम पूज्य मुनि श्री 108 सुहित सागर महाराज के परिवारजन लता, प्रमोद जैन , अनिल जैन, सचिन जैन, मयूरी जैन, शैलेंद्र जैन, नेहा जैन, नैतिक जैन, खुशी जैन, भूमिका जैन सहित समस्त माहेश्वरी परिवार को प्राप्त हुआ। जगदीश  जैन, जिनेंद्र  जैन, भरत  गंगावत, नरेंद्र  चित्तौड़ा सहित अन्य श्रद्धालुओं ने भी निर्वाण लड्डू अर्पित कर पुण्यार्जन किया। बाहर से आए भक्तों ने भी पूज्य मुनिश्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साह एवं भक्तिभाव के साथ निर्वाण लड्डू चढ़ाकर धर्मलाभ लिया।

इस अवसर पर मुनि  सागर महाराज ने कहा कि “बैर नहीं करना है, क्षमा को धारण करना है।” उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के जीवन एवं मरुभूति-कामठ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि बैर, विरोध और कषाय अत्यंत खतरनाक होते हैं। मनुष्य के भाव ही उसके कर्मों की दिशा तय करते हैं।

उन्होंने कहा कि पार्श्वनाथ भगवान ने युवावस्था में ही संसार की नश्वरता को समझ लिया और जीवों के कल्याण एवं आत्मशुद्धि के लिए सांसारिक वैभव का त्याग कर दिया। कठोर तप एवं साधना के माध्यम से केवलज्ञान प्राप्त कर उन्होंने समस्त जीवों को सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह एवं आत्मसंयम का मार्ग बताया।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ ने चार महान व्रत—अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह—का उपदेश दिया। उनका जीवन इस बात का आदर्श है कि मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मसंयम, तप, त्याग और समता में सच्चे सुख को प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने कहा कि दीर्घकाल तक धर्म की प्रभावना एवं जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देने के पश्चात भगवान पार्श्वनाथ ने सम्मेद शिखरजी की पावन भूमि पर निर्वाण प्राप्त किया। जैन परंपरा में उनका निर्वाण कल्याणक अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि “वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता, क्षमा ही वैर की अग्नि को शांत करती है।” मरुभूति ने क्षमा और आत्मशुद्धि का मार्ग चुना, जबकि कामठ क्रोध और वैर में जलता रहा। कामठ का क्रोध उसे पतन की ओर ले गया और मरुभूति का संयम उसे मोक्षमार्ग की ओर। दूसरे को हराने से बड़ी विजय स्वयं के क्रोध, अहंकार और द्वेष पर विजय प्राप्त करना है।

उन्होंने कहा कि मरुभूति और कामठ का प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि हमारे भीतर चल रहे क्रोध और क्षमा के संघर्ष का दर्पण है। भगवान पार्श्वनाथ का जीवन हमें करुणा, क्षमा, अहिंसा और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। अहिंसा एवं संयम के मार्ग पर चलकर ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।

शाम 6:30 बजे गुरु भक्ति का आयोजन किया गया। इसके बाद छहढाला जी का प्रवचन एवं आरती संपन्न हुई। 

पंडित भुवनेश शास्त्री ने बताया कि कार्यक्रम में धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष कुंथु कुमार जैन, चातुर्मास समिति अध्यक्ष महेंद्र  टाया, प्रकाश अखावत, राजेंद्र अखावत, मीडिया प्रभारी रमेश जैन, कैलाश गंगवाल, नरेंद्र टाया, जगदीश जैन, मनोज जैन, पंकज जैन, पारस जैन, हेमंत जैन, मनीष जैन, अशोक जैन, जिनेंद्र जैन, दिनेश जैन, रमेश जैन, प्रणीत जैन, मातृशक्ति में अर्चना जैन, संगीता जैन, सर्वेश जैन, प्रभा जैन, संपत जैन, इंदिरा जैन, कल्पना जैन, निर्मला जैन, मंजू जैन एवं सरोज जैन सहित अनेक श्रावक श्राविकाओ ने धर्मलाभ लिया।

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