बदनसीब पिता की सिसकियां: ‘मंजू ने बच्चों को ही खत्म कर दिया’… इंटरनेट के ‘कर्क’ रोग ने दी ऐसी खौफनाक सजा!

“जिस ममता पर मुझे नाज़ था, वही मेरे बच्चों की काल बन जाएगी, ऐसा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।” ये शब्द उस बदनसीब पिता राजू के हैं, जिसकी दुनिया 11 जनवरी की सुबह हमेशा के लिए उजड़ गई। भीलवाड़ा के इस सनसनीखेज मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ एक मां ने यूट्यूब पर बीमारी के वीडियो देख-देखकर उपजे डर के कारण अपने ही दो मासूम बच्चों को मौत के घाट उतार दिया।

ममता की ‘कातिल’ बन गई इंटरनेट की सनक

38 वर्षीय राजू के लिए 11 जनवरी की सुबह किसी कयामत से कम नहीं थी। उन्होंने बताया कि उस सुबह सब कुछ सामान्य था। पत्नी मंजू के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, सबने साथ बैठकर खाना खाया। लेकिन दोपहर 11:30 बजे पिता के एक फोन ने उनकी दुनिया पलट दी— “मंजू ने बच्चों को खत्म कर दिया है।”

जब राजू घर पहुंचे, तो वहां 10 साल की बेटी नेहा और 6 साल के बेटे भेरू की सांसें थम चुकी थीं। जिस मां को अपने बच्चों से इतना प्यार था कि वह उनके साथ रील बनाती थी, उन्हें सजाती-संवारती थी, उसी मां ने रस्सी और सरिए से बड़ी बेरहमी से अपने ही जिगर के टुकड़ों की जान ले ली।

वहम का खौफनाक अंत: ‘मेरे बाद बच्चों का क्या होगा?’

जांच में जो सच सामने आया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। मंजू के मुंह में कुछ मामूली छाले हुए थे। डॉक्टरों के पास जाने के बजाय उसने यूट्यूब पर इसके लक्षण ढूंढना शुरू कर दिया। इंटरनेट के ‘अधूरे ज्ञान’ ने उसके मन में यह वहम बैठा दिया कि उसे कैंसर है और वह जल्द ही मर जाएगी। इसी आत्मघाती सोच और इस डर ने कि ‘मेरे मरने के बाद इन बच्चों को कौन संभालेगा’, उसे कातिल बना दिया। उसने सोचा कि खुद के मरने से पहले बच्चों को मारना ही उनके लिए ‘सुरक्षित’ है।

“अब उसके साथ नहीं रह सकता, डर लगता है”

अपनी सुबकियों को रोकते हुए राजू कहते हैं कि उन्हें अब अपनी पत्नी से डर लगने लगा है। उन्होंने भारी मन से कहा, “मैं उसके खिलाफ केस नहीं लड़ूंगा, कानून अपना काम करेगा। लेकिन अब मैं उस औरत के साथ नहीं रह सकता। जो मां अपने बच्चों की नहीं हुई, वो शायद सोते हुए मुझे भी मार डाले। मेरा सब कुछ उजड़ गया, अब बस इन सूनी दीवारों में बच्चों की यादें बची हैं।”

समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी

भीलवाड़ा की यह घटना आज के डिजिटल युग के लिए एक गंभीर चेतावनी है। छोटी-सी बीमारी को इंटरनेट पर सर्च करके उसे गंभीर मान लेना और मानसिक तनाव में आकर ऐसे खौफनाक कदम उठाना एक सामाजिक बीमारी बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि मोबाइल के ‘वहम’ पर भरोसा करने के बजाय अपनों से बात करना और डॉक्टरी सलाह लेना ही जीवन बचा सकता है।

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