50 साल की सेवा पर भारी पड़ी अफसरों की सनक, मटके जब्त, रो पड़ा सेवादार

उदयपुर। झीलों की नगरी में नगर निगम के अमानवीय और क्रूर चेहरे ने आज मानवता को शर्मसार कर दिया। शहर के आलीशान होटलों, रसूखदारों के अवैध निर्माणों और सड़कों को निगल जाने वाले बड़े अतिक्रमणों पर कुंभकर्णी नींद सोने वाला नगर निगम आज एक निहत्थे बुजुर्ग की प्याऊ पर अपनी ‘बहादुरी’ दिखाता नजर आया। जिला कलेक्ट्री के बाहर, जहां इंसाफ की उम्मीद की जाती है, वहीं पिछले 50 सालों से राहगीरों का गला तर करने वाले एक बुजुर्ग की सेवा को नगर निगम की टीम ने मलबे में तब्दील कर दिया। निगम के दस्ते ने न केवल प्याऊ को हटाया, बल्कि भीषण गर्मी में लोगों की प्यास बुझाने वाले ठंडे पानी के मटकों को भी ऐसे जब्त किया जैसे वे कोई अवैध हथियार हों।

हैरानी और गुस्से की बात यह है कि यह प्याऊ न तो यातायात में बाधा थी और न ही किसी के लिए परेशानी का सबब। बुजुर्ग ने सिर्फ पानी को ठंडा रखने के लिए ऊपर लकड़ी की एक मामूली पटिया रखी थी, ताकि चिलचिलाती धूप में कलेक्ट्री आने वाले गरीब फरियादियों को राहत मिल सके। लेकिन संवेदना शून्य हो चुके निगम कर्मियों को इस सेवा भाव में ‘अतिक्रमण’ नजर आ गया। जब टीम मटके उठाकर ले जाने लगी, तो आधी सदी से निस्वार्थ भाव से पानी पिला रहे बुजुर्ग की हिम्मत जवाब दे गई। मौके पर मौजूद लोगों के कलेजे तब फट गए जब वह बुजुर्ग बिलख-बिलख कर रो पड़ा। उसकी आंखों से निकलते आंसू उस सिस्टम पर तमाचा थे जो अमीरों के अवैध कब्जों के सामने दुम दबाकर खड़ा रहता है।
बुजुर्ग के आंसू देख वहां मौजूद आम जनता का गुस्सा फूट पड़ा और लोगों ने नगर निगम की कार्यशैली की जमकर लानत-मलानत की। लोगों का सीधा सवाल है कि क्या नगर निगम की ताकत सिर्फ गरीबों और सेवादारों पर ही चलती है? शहर में जगह-जगह रसूखदारों ने फुटपाथों को अपनी जागीर बना रखा है, वहां निगम की गाड़ियां रास्ता बदलकर निकल जाती हैं, लेकिन एक बुजुर्ग जो पुण्य का काम कर रहा था, उसे अपराधी की तरह प्रताड़ित किया गया। इस कार्रवाई ने उदयपुर नगर निगम की प्राथमिकताओं और उसकी नैतिकता पर एक ऐसा काला धब्बा लगा दिया है, जिसका जवाब शहर की जनता अब निगम के हुक्मरानों से मांग रही है।
