चार दिवसीय आध्यात्मिक आयोजन में जिनवाणी प्रवाह, सर्वज्ञ देव विधान एवं धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हुआ आयोजन; आयोजक मंडल ने साधर्मियों, सहयोगी संस्थाओं और सेवाभावी कार्यकर्ताओं का जताया आभार
उदयपुर। श्री दिगम्बर जैन मुमुक्षु मंडल ट्रस्ट, उदयपुर एवं श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट, मुंबई के तत्वावधान में आयोजित नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन का समापन धर्म, दर्शन, जिनवाणी आराधना एवं आध्यात्मिक उल्लास के वातावरण में हुआ। चार दिवसीय इस आयोजन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे विद्वानों के प्रवचनों, धार्मिक विधानों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और सामूहिक भक्ति के माध्यम से साधर्मियों को जैन दर्शन के सिद्धांतों को समझने तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
प्रचार-प्रसार विभाग के डॉ. निलेश जैन ने बताया कि कन्वेंशन के अंतिम दिवस प्रातःकाल श्री चौबीस तीर्थंकर विधान का आयोजन श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ किया गया। विधान में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। डॉ. विराग शास्त्री, डॉ. अंकित शास्त्री एवं डॉ. तपिश शास्त्री ने पूजन एवं विधान की धार्मिक विधियां संपन्न कराईं। जिनेंद्र भगवान की आराधना, जिनवाणी के प्रति श्रद्धा तथा तीर्थंकरों के गुणों के स्मरण से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।
श्री चौबीस तीर्थंकर विधान में श्रद्धालुओं ने की सहभागिता

20 अक्टूबर 2026 को आयोजित श्री चौबीस तीर्थंकर विधान के आमंत्रणकर्ता श्रीमती मीना देवी एवं श्री भावेश हेमा कालिका परिवार रहे। मुख्य कलश का सौभाग्य श्रीमती निकिता एवं नरेंद्र जी गंगावत परिवार को प्राप्त हुआ।विधान में कलश विराजमानकर्ता के रूप में श्रीमती पुष्पा देवी ने नावड़िया परिवार की ओर से सहभागिता की। इसके साथ श्री किरणदेवी जी किकावत, लुणदा, तथा श्रीमती सरिताजी, माया जी भोरावत एवं गंगावत परिवार का भी सहयोग रहा। जिनवाणी विराजमानकर्ता के रूप में श्री छोटेलाल जी बोहरा, श्रीमती ललिता जी गोदावत, श्री राजेंद्र विशाल पंचोली, श्री अनिल जी नलवाया तथा श्री राजकुमार, कमल एवं भरत भोरावत ने सहभागिता की। स्व. श्री भंवरलाल जी की स्मृति में श्री सुरेश जी ताराचंदोत का भी इस आयोजन से विशेष जुड़ाव रहा। विधान के माध्यम से श्रद्धालुओं ने चौबीस तीर्थंकरों के वीतराग स्वरूप, उनके उपदेशों और आत्मशुद्धि के मार्ग का स्मरण किया। जैन दर्शन में तीर्थंकरों की आराधना का मूल उद्देश्य उनके गुणों का स्मरण करते हुए स्वयं के भीतर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की भावना को जागृत करना है।
पांच समवाय एवं अनेकांत-स्याद्वाद पर विद्वानों के प्रवचनों से मिला मार्गदर्शन

पूजन एवं विधान के पश्चात अल्पाहार हुआ। इसके बाद प्रवचन सत्र में खैरागढ़ के पं. अभय जी शास्त्री ने पांच समवाय विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने सरल भाषा, सहज उदाहरणों और प्रभावशाली शैली के माध्यम से जैन दर्शन के इस महत्वपूर्ण विषय को समझाया। उनके प्रवचन से श्रोताओं को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को समझने तथा धर्म के सिद्धांतों पर चिंतन करने की प्रेरणा मिली।
इसके पश्चात करेली के पं. अनुभव जी जैन ने अनेकांतवाद एवं स्याद्वाद विषय पर धारा प्रवाह प्रवचन दिया। उन्होंने जैन धर्म की इस विशिष्ट दार्शनिक परंपरा को सरल एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
अनेकांतवाद हमें किसी भी वस्तु या विषय को एकांगी दृष्टि से देखने के स्थान पर उसके अनेक पक्षों को समझने की प्रेरणा देता है। वहीं स्याद्वाद कथन में अपेक्षा और दृष्टिकोण की मर्यादा को स्पष्ट करता है। वर्तमान समय में, जब विचारों के मतभेद अनेक बार विवाद का रूप ले लेते हैं, तब अनेकांत की दृष्टि संवाद, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान का मार्ग प्रशस्त करती है।
कन्वेंशन के पूर्ववर्ती सत्रों में नागपुर के पं. विपिन जी शास्त्री ने मूलाचार विषय पर भी महत्वपूर्ण धार्मिक व्याख्यान दिया। इस प्रकार विभिन्न विद्वानों के प्रवचनों के माध्यम से पांच समवाय, अनेकांतवाद, स्याद्वाद एवं मूलाचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर धर्मप्रेमियों को चिंतन और अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ।
समापन सभा में विद्वानों का सम्मान

नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन की समापन सभा में आयोजन के दौरान मार्गदर्शन देने वाले विद्वानों एवं अतिथियों का सम्मान किया गया। कन्वेंशन के निदेशक डॉ. विराग जी शास्त्री तथा बाहर से पधारे विद्वान पं. अभय जी शास्त्री, खैरागढ़; पं. अनुभव जी जैन, करेली; एवं पं. विपिन जी शास्त्री, नागपुर का उपरणा, शॉल एवं माला पहनाकर सम्मान किया गया।
श्री सुरेश भोरावत ने कहा कि विद्वानों का सानिध्य किसी भी धार्मिक आयोजन की महत्वपूर्ण उपलब्धि होता है। उनके द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय विषयों की सरल व्याख्या से श्रद्धालुओं को जैन दर्शन को गहराई से समझने और उसे अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है। ऐसे आयोजन धर्म के मूल सिद्धांतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा युवाओं में आध्यात्मिक जागरूकता विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
नि:स्वार्थ सेवा देने वाले कार्यकर्ताओं एवं सहयोगी संस्थाओं का आभार
चार दिवसीय आयोजन को सफल बनाने में विभिन्न विभागों के कार्यकर्ताओं, सहयोगियों, साधर्मियों एवं सहयोगी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम के दौरान व्यवस्था, धार्मिक आयोजन, अतिथियों के स्वागत, प्रचार-प्रसार तथा अन्य दायित्वों में अनेक कार्यकर्ताओं ने नि:स्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं दीं।आयोजक मंडल की ओर से अभय बंडी एवं डॉ. तपिश शास्त्री ने सभी उपस्थित साधर्मियों, आयोजन में सहयोग देने वाले कार्यकर्ताओं, सहयोगियों तथा सहभागी संस्थाओं और संगठनों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में प्रत्येक सहयोगी के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सामूहिक सहभागिता, समर्पण और सेवा भावना से ही ऐसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन सफल होते हैं। जिनधर्म की प्रभावना के लिए किया गया प्रत्येक छोटा-बड़ा प्रयास समाज को धर्म, संस्कार और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक होता है। आयोजन मंडल ने सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार धर्मप्रभावना के कार्यों में सहभागिता की भावना बनाए रखने का आह्वान किया।
शोभायात्रा के साथ श्रीजी को जिनमंदिर में विधिपूर्वक किया विराजमान
समापन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण एवं भावपूर्ण प्रसंग श्रीजी जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा को कार्यक्रम स्थल से शोभायात्रा के माध्यम से श्री 1008 चंद्रप्रभ दिगम्बर जिन चैत्यालय के जिनमंदिर तक ले जाना रहा। श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ निकली शोभायात्रा के पश्चात विधिपूर्वक श्रीजी को जिनमंदिर में विराजमान किया गया।इस अवसर पर उपस्थित धर्मप्रेमियों ने जिनेंद्र भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। धार्मिक विधि-विधान एवं भक्ति के वातावरण में संपन्न इस प्रसंग ने चार दिवसीय आयोजन को एक आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान की।जैन परंपरा में जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा के प्रति श्रद्धा, वीतरागता के गुणों का स्मरण और जिनवाणी के प्रति समर्पण आत्मकल्याण की भावना से जुड़े हैं। श्रीजी को जिनमंदिर में विराजमान करने का यह प्रसंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष भावनात्मक एवं धार्मिक महत्व का रहा।
युवाओं को जिनवाणी और आत्मचिंतन से जोड़ने का सार्थक प्रयास
नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन ने अपने चार दिवसीय आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया कि जैन धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन को सही दृष्टि से देखने, आत्मस्वरूप को समझने, विचारों में संतुलन रखने और संयमपूर्ण आचरण अपनाने की प्रेरणा देता है। विद्वानों के प्रवचन, चौबीस तीर्थंकर विधान, जिनवाणी आराधना, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और सामूहिक सहभागिता ने सम्मेलन को बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से युवाओं के लिए ऐसे आयोजन धर्म के सिद्धांतों को समझने, जैन दर्शन के प्रति रुचि विकसित करने तथा आध्यात्मिक मूल्यों को व्यवहार में उतारने का अवसर प्रदान करते हैं। इस प्रकार नवम जिनदेशना यूथ कन्वेंशन का समापन जिनवाणी के प्रति अनुराग, विद्वानों के प्रति सम्मान, कार्यकर्ताओं के प्रति कृतज्ञता और जिनेंद्र भगवान की आराधना के भाव के साथ हुआ। आयोजन ने समाज में धार्मिक चेतना, सांस्कृतिक संस्कारों और आध्यात्मिक जागरूकता को सुदृढ़ करने का संदेश दिया।
