राजस्थान में 8000 डॉक्टर SOG के रडार पर, विदेश से लाई डिग्रियों और रसूख के दम पर चल रहा था मौत का खेल

सफेद कोट पर ‘फर्जीवाड़े’ के दाग

जयपुर। राजस्थान के चिकित्सा जगत में उस वक्त हड़कंप मच गया जब प्रदेश की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने अब तक के सबसे बड़े ‘मेडिकल स्कैम’ की परतें खोलना शुरू कर दीं। दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के करीब 8 हजार से ज्यादा डॉक्टर इस वक्त एसओजी के रडार पर हैं, जिन पर फर्जी सर्टिफिकेट और जाली दस्तावेजों के आधार पर प्रैक्टिस करने का गंभीर संदेह है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में केवल डॉक्टर ही नहीं, बल्कि राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) के वे आला अफसर भी जांच के दायरे में आ गए हैं, जिन्होंने आंखों पर पट्टी बांधकर इन फर्जी डिग्रियों को हरी झंडी दिखाई। जांच का यह सिलसिला करीब एक माह पहले शुरू हुआ था, जब तीन ऐसे डॉक्टरों को दबोचा गया जो विदेश से मेडिकल की पढ़ाई कर लौटे थे, लेकिन भारत में अनिवार्य पात्रता परीक्षा (FMGE) पास किए बिना ही सरकारी अस्पतालों में इंटर्नशिप कर रहे थे।

पकड़े गए आरोपियों डॉ. पियूष कुमार त्रिवेदी, डॉ. देवेंद्र गुर्जर और डॉ. शुभम गुर्जर से हुई गहन पूछताछ ने एक ऐसे नेक्सस का पर्दाफाश किया है जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। जांच में सामने आया कि ये छात्र किर्गिस्तान, जॉर्जिया, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों से एमबीबीएस की डिग्री तो ले आए, लेकिन भारत में प्रैक्टिस के लिए जरूरी नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBE) की परीक्षा में फेल हो गए। इसके बाद शुरू हुआ ‘सेटिंग’ का खेल, जहां 16-16 लाख रुपए की मोटी रिश्वत देकर फर्जी एफएमजीई सर्टिफिकेट हासिल किए गए। हैरान करने वाली बात यह है कि इन्हीं जाली कागजों के दम पर इन लोगों ने करौली, अलवर और दौसा जैसे सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बकायदा इंटर्नशिप भी पूरी कर ली। एसओजी को अब शक है कि यह तो महज एक ट्रेलर है, असली फिल्म में हजारों ऐसे चेहरे शामिल हो सकते हैं जो या तो बड़े निजी अस्पतालों में सेवा दे रहे हैं या घरों में अपनी क्लीनिक चलाकर जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।

इस पूरे फर्जीवाड़े ने राजस्थान मेडिकल काउंसिल की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नियमानुसार, किसी भी डॉक्टर के पंजीकरण के लिए एक बहुस्तरीय प्रक्रिया होती है जिसमें ऑनलाइन आवेदन के साथ-साथ दस्तावेजों का व्यक्तिगत भौतिक सत्यापन (Physical Verification) अनिवार्य है। जब प्रक्रिया इतनी सख्त है, तो सवाल उठता है कि बिना मिलीभगत के जाली सर्टिफिकेट को मंजूरी कैसे मिल गई? एसओजी अब नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन और विदेशों की यूनिवर्सिटीज से सीधे संपर्क साध रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि डॉक्टरों द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों में कितनी सच्चाई है। जांच एजेंसी अब उस हर अधिकारी की भूमिका खंगाल रही है, जिसकी टेबल से ये फाइलें पास हुई थीं। आने वाले दिनों में चिकित्सा महकमे में बड़ी गिरफ्तारियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मामला अब केवल भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि आम जनता की जिंदगी से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

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