सफेद ऑडी नहीं, मौत का ‘सर्कस’ थी वह रफ्तार

गुलाबी नगरी की पत्रकार कॉलोनी में शुक्रवार की रात किसी खौफनाक मंजर से कम नहीं थी, जहां खरबास सर्किल के पास सन्नाटे को चीरती हुई एक सफेद ऑडी कार काल बनकर आई और पलक झपकते ही वहां बिछ गई लाशें और बिखरा मिला खून। रात के करीब साढ़े नौ बजे जब लोग ठेलों पर चाट-पकौड़ी का लुत्फ उठा रहे थे और अपनी दिनभर की थकान मिटा रहे थे, तभी नशे में धुत रईसजादों की रफ्तार ने वहां ऐसा तांडव मचाया कि देखने वालों की रूह कांप उठी। चश्मदीदों की मानें तो धमाका इतना जोरदार था कि लगा जैसे कोई बम फटा हो, लेकिन जब तक धूल और धुएं का गुबार छंटता, तब तक कार 30 मीटर तक लोगों को रौंदते हुए निकल चुकी थी। हाथ में खाने की प्लेट लिए खड़े लोग अगले ही पल खून से लथपथ होकर तड़प रहे थे और सड़क किनारे की थड़ियां मलबे में तब्दील हो चुकी थीं।
हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बेलगाम रफ्तार ने न सिर्फ रमेश नाम के शख्स की जान ली, बल्कि 11 परिवारों की खुशियां और रोजी-रोटी भी छीन ली। घटनास्थल पर बिखरा हुआ सामान, टूटे कांच और पलटी हुई गाड़ियां उन रईसजादों के ‘शौक’ की गवाही दे रही थीं, जिनके लिए शहर की सड़कें कोई पर्सनल रेस ट्रैक बन गई हैं। इस हाई-प्रोफाइल एक्सीडेंट की जांच में एक चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब पता चला कि मौत बनकर दौड़ी इस ऑडी कार का रजिस्ट्रेशन नंबर दमन और दीव का है और यह किसी व्यक्ति के बजाय एक ट्रस्ट के नाम पर पंजीकृत है। पुलिस अब इस गुत्थी को सुलझाने में जुटी है कि आखिर उस रात उस ‘मौत की मशीन’ को कौन चला रहा था और वह ट्रस्ट किसका है।
इस हादसे ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस की गश्त पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि सूचना मिलते ही चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर और डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा अस्पताल पहुंचे, लेकिन जनता के मन में यह कड़वा सवाल बरकरार है कि क्या रईसजादों की इस ‘स्पीड और शराब’ के आगे आम आदमी की जान इतनी सस्ती है? सड़क किनारे रेहड़ी लगाकर अपना पेट पालने वालों के लिए वह शुक्रवार की रात कभी न खत्म होने वाला अंधेरा लेकर आई है। अब देखना यह है कि क्या रसूखदार मालिकों तक पुलिस के हाथ पहुंच पाएंगे या फिर यह मामला भी फाइल में दबकर रह जाएगा।
