सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह नीति और संविधान के खिलाफ, राज्य सरकार की अधिसूचना रद्द

नई दिल्ली/जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि देश में किसी भी राजस्व गांव का नाम किसी व्यक्ति, धर्म, जाति या उपजाति के आधार पर नहीं रखा जा सकता। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने बाड़मेर (राजस्थान) के एक मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना और हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है।
क्या है पूरा मामला? मामला बाड़मेर जिले की सोडा ग्राम पंचायत से जुड़ा है, जहां राज्य सरकार ने दो नए राजस्व गांव बनाए थे। इन गांवों के नाम अमराराम और सगत सिंह नामक व्यक्तियों के नाम पर क्रमशः ‘अमरगढ़’ और ‘सगतसर’ रखे गए थे। इन दोनों व्यक्तियों ने गांव के विकास के लिए अपनी निजी जमीन दान में दी थी। सरकार ने 31 दिसंबर 2020 को इनके नाम की अधिसूचना जारी की थी, जिसे भीकाराम और अन्य ने अदालत में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुँचा विवाद इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 11 जुलाई 2025 को सरकार के नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया था। हालांकि, बाद में डिवीजन बेंच ने 5 अगस्त 2025 को एकलपीठ के आदेश को पलटते हुए सरकार के फैसले को सही ठहराया। अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने डिवीजन बेंच के आदेश को खारिज कर दिया।
संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार अपनी ही तय नीति से हटकर काम नहीं कर सकती। साल 2009 का सरकारी सर्कुलर स्पष्ट रूप से कहता है कि गांव का नाम व्यक्ति या जाति विशेष पर नहीं होगा। अदालत ने कहा कि नीति में बदलाव किए बिना उससे अलग जाकर कार्रवाई करना ‘मनमाना’ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने साफ किया कि कोई अधिसूचना किसी नीतिगत निर्णय (Policy Decision) से ऊपर नहीं हो सकती।
