
नई दिल्ली: आवारा कुत्तों के आतंक पर लगाम कसने के लिए अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए उन ‘डॉग लवर्स’ और संगठनों को सीधे निशाने पर लिया है जो सड़कों पर कुत्तों को खाना तो खिलाते हैं, लेकिन उनके हमलों की जिम्मेदारी लेने से कतराते हैं। कोर्ट ने साफ लफ्जों में पूछा है कि जब सड़कों पर बेसहारा बच्चे और बुजुर्ग इन कुत्तों का शिकार बनते हैं, तो आखिर उनकी मौत का जवाबदार कौन है?
जस्टिस की बेंच ने एक 9 साल के मासूम की मौत का दर्दनाक जिक्र करते हुए पूछा कि क्या अदालत अपनी आंखें बंद कर ले? कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि अब जवाबदेही तय करने के लिए एक ऐसा सख्त ढांचा तैयार किया जाएगा जिसमें लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब कुत्ते के काटने से होने वाली मौत या चोट के मामलों में राज्य सरकार को भारी-भरकम मुआवजा देना होगा। इतना ही नहीं, जो लोग कुत्तों को पालते हैं या उनकी पैरवी करते हैं, उनकी भी जिम्मेदारी अब कानूनी रूप से तय की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स को दो टूक सलाह दी है कि अगर उन्हें कुत्तों को खाना खिलाना है या उनकी देखभाल करनी है, तो वे यह काम अपने घर के परिसर या कंपाउंड के भीतर करें। कोर्ट ने सवाल उठाया कि कुत्तों को बाहर घूमने और राहगीरों के लिए खतरा पैदा करने की इजाजत क्यों दी जानी चाहिए? पिछली सुनवाई का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने कुत्तों के साथ क्रूरता के वीडियो देखने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि ऐसे वीडियो की भी भरमार है जहां कुत्ते मासूमों को अपना शिकार बना रहे हैं। अब केंद्र और राज्य सरकारों को अदालत के उन ‘गंभीर सवालों’ का जवाब देना होगा जो सीधे आम नागरिक की सुरक्षा से जुड़े हैं।
