
अजमेर। कहते हैं कि हुनर उम्र और किताबी शिक्षा का मोहताज नहीं होता। इस बात को सच कर दिखाया है अजमेर के तिलोनिया गांव की इन बुजुर्ग महिलाओं ने। जिन्हें दुनिया ‘दादी-नानी’ कहकर पुकारती है, वे आज किसी बड़े संस्थान के इंजीनियरों को मात दे रही हैं। बिना किसी फॉर्मल डिग्री के ये महिलाएं सोलर बल्ब, पंखे और कुकर बनाने से लेकर उनकी मरम्मत तक में माहिर हो चुकी हैं। ताज्जुब की बात यह है कि कभी खेत में मजदूरी करने वाली इन महिलाओं ने अब तक 96 देशों की करीब 4 हजार से ज्यादा महिलाओं को सोलर तकनीक की ट्रेनिंग दी है।

यह पूरी जादुई कहानी अजमेर के ‘बेयरफुट कॉलेज’ (Barefoot College) की है, जिसकी स्थापना 1972 में सामाजिक कार्यकर्ता संजीत बंकर रॉय ने की थी। इस कॉलेज की खासियत यह है कि यहाँ किताबों से ज्यादा प्रैक्टिकल पर जोर दिया जाता है। यहाँ आने वाली अधिकांश महिलाएं या तो कभी स्कूल नहीं गईं या फिर महज तीसरी-चौथी कक्षा तक ही पढ़ी हैं। लेकिन आज ये ‘सोलर इंजीनियर’ सोलर पैनल, बैटरी चार्जर, इन्वर्टर और पेचीदा वायरिंग को चुटकियों में दुरुस्त कर देती हैं। इनके हुनर का कायल सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया है। दलाई लामा से लेकर प्रिंस चार्ल्स और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन तक इन महिलाओं के काम की सराहना कर चुके हैं।

इनकी टीम में शामिल फलोदा की 60 वर्षीय लीला देवी तीसरी पास हैं, लेकिन वह अब तक 3 हजार महिलाओं को ट्रेन कर चुकी हैं। वहीं, बावड़ी की 55 वर्षीय मगन कंवर पिछले 35 सालों से इस फील्ड में सक्रिय हैं और सोलर लाइटों के मेंटेनेंस का काम संभाल रही हैं। इनमें से कोई पहले सिलाई करती थी तो कोई मजदूरी, लेकिन आज वे आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं। यहां तक कि कोरोना काल में ड्राइविंग का काम बंद होने पर माया देवी ने सोलर ट्रेनिंग ली और अब वे दूसरों को सिखा रही हैं। कॉलेज के सोलर प्रभारी कमलेश बिष्ट बताते हैं कि यह संस्थान न केवल ट्रेनिंग देता है, बल्कि खुद भी 300 किलोवाट के सोलर प्लांट से अपनी बिजली बनाता है। ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि अगर मौका मिले, तो गांव की अनपढ़ महिला भी पूरी दुनिया को रोशन कर सकती है।
