
पलपल @ महावीर व्यास
बांसवाड़ा। राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में आज का दिन किसी बड़े ऐतिहासिक मोड़ से कम नहीं आंका जा रहा है। मरूधरा की माटी पर एक ऐसा सियासी बवंडर उठा है, जिसकी तपिश ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है, तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खेमे में जश्न का माहौल है। वागड़ अंचल के निर्विवाद ‘महाक्षत्रप’ और आदिवासी जनमानस की बुलंद आवाज महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने आखिरकार भगवा चोला उतारकर फिर से तिरंगे झंडे के नीचे आने का अंतिम फैसला कर लिया है। जयपुर के कांस्टीट्यूशन क्लब में हुई एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा में जाने का मालवीय का ‘प्रयोग’ अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वे अपनी पुरानी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। प्रदेश की राजनीति के इस सबसे बड़े यू-टर्न ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में विचारधारा और जनसमर्थन के बिना कद बचाना नामुमकिन है।
सत्ता की चमक से मोहभंग और कार्यकर्ताओं की पुकार
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा उस वक्त लिखी जाने लगी थी जब लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने मालवीय को हतप्रभ कर दिया था। फरवरी 2024 में जब मालवीय ने कांग्रेस की विधायकी और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा था, तब इसे कांग्रेस के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा था। भाजपा ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीट से अपना चेहरा बनाया। लेकिन, जिस वागड़ के वे बेताज बादशाह कहे जाते थे, वहीं की जनता ने भाजपा के सिंबल पर उन्हें नकार दिया। हार के बाद भाजपा के भीतर बढ़ती गुटबाजी और स्थानीय नेताओं के साथ तालमेल की कमी ने मालवीय को यह अहसास करा दिया कि वे जिस ‘सिस्टम’ का हिस्सा बने हैं, वह उनकी कार्यशैली के अनुरूप नहीं है। मीडिया के कैमरों के सामने अपना पक्ष रखते हुए मालवीय ने बड़े ही बेबाक अंदाज में कहा कि भाजपा उनके लायक पार्टी नहीं है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “मैं एक ऐसा नेता हूँ जो जनता के बीच रहता है, लेकिन भाजपा के बंद कमरों की राजनीति ने मेरा दम घोंट दिया। मेरे कार्यकर्ताओं ने मुझसे कहा कि साहब, आप वहां शोभा नहीं देते, आपकी जगह तो कांग्रेस के खुले मैदान में है।”
जयपुर से दिल्ली तक हलचल, दिग्गजों की मौजूदगी में हुई मंत्रणा
मालवीय की घर वापसी की पटकथा को अंतिम रूप देने के लिए जयपुर में कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले नेताओं ने बिसात बिछाई। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली के साथ मालवीय की लंबी बातचीत हुई। सूत्रों का कहना है कि मालवीय ने अपनी पिछली गलतियों को स्वीकार करते हुए पार्टी के प्रति फिर से निष्ठा जताई है। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भी यह भांप लिया है कि दक्षिण राजस्थान में आदिवासी वोटों को फिर से एकजुट करने के लिए मालवीय जैसा कद्दावर चेहरा बेहद जरूरी है। यही कारण है कि आलाकमान ने बिना देरी किए उन्हें ‘ग्रीन सिग्नल’ दे दिया। मालवीय ने तो यहां तक कह दिया कि वे औपचारिकता के लिए भी रुकना नहीं चाहते और आज ही तिरंगा दुपट्टा ओढ़कर मैदान में उतरने को तैयार हैं।
वागड़ के सियासी समीकरणों पर गहरा असर
महेंद्रजीत सिंह मालवीय का कांग्रेस में लौटना केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण राजस्थान की दर्जनों विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव डालने वाला कदम है। बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिलों की आदिवासी राजनीति में मालवीय का अपना एक अलग प्रभाव क्षेत्र है। भाजपा ने उन्हें शामिल करके जिस आदिवासी वोट बैंक को साधने का सपना देखा था, वह अब चकनाचूर होता दिख रहा है। दूसरी ओर, भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कांग्रेस अब मालवीय को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक सेटबैक है, क्योंकि पार्टी ने मालवीय के लिए अपनी ही पुरानी कैडर को नाराज किया था और अब मालवीय के जाने के बाद भाजपा के पास उस क्षेत्र में कोई बड़ा सर्वमान्य चेहरा नहीं बचा है।
भविष्य की रणनीति और सदस्यता का भव्य समारोह
आने वाले दो-तीन दिनों के भीतर जयपुर के प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय (PCC) में एक विशाल समारोह आयोजित करने की तैयारी है, जिसमें मालवीय अपने हजारों समर्थकों के साथ फिर से कांग्रेस की शपथ लेंगे। यह आयोजन शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है ताकि भाजपा को यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेस का किला आज भी मजबूत है। मालवीय ने साफ कर दिया है कि वे अब बिना किसी शर्त के कांग्रेस के एक सिपाही के रूप में काम करेंगे। इस खबर ने पूरे प्रदेश में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है कि क्या मालवीय के पीछे-पीछे भाजपा में गए अन्य ‘असंतुष्ट’ कांग्रेसी भी अब घर वापसी की लाइन में लगेंगे? फिलहाल, राजस्थान की राजनीति का यह सबसे बड़ा ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंच चुका है, और जीत का सेहरा फिलहाल कांग्रेस के सिर बंधता दिख रहा है।
