आयड़ का ‘ज़हर’ और 12 गाँवों का ‘हल्ला बोल’, अब ढोल बजाकर प्रशासन की नींद उड़ाएगा मेवाड़

उदयपुर। उदयपुर की ऐतिहासिक आयड़ नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और इसके साथ ही नदी किनारे बसे दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीणों का जीवन भी दांव पर लग गया है। शहर के बीचों-बीच बहने वाली यह नदी, जो कभी मेवाड़ की पहचान हुआ करती थी, अब औद्योगिक इकाइयों और शहरी गंदगी के कारण एक जहरीले नाले में तब्दील हो चुकी है। इस गंभीर संकट से त्रस्त होकर अब क्षेत्र के 12 से अधिक गांवों के ग्रामीणों ने प्रशासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। मेवाड़ किसान संघर्ष समिति और झील बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में ग्रामीण बुधवार को सुबह 11:30 बजे कानपुर की नदी पुलिया पर एकत्रित होकर एक अनूठा और पुरजोर विरोध प्रदर्शन करेंगे। इस आंदोलन की गूंज ‘ढोल’ की थाप के साथ सुनाई देगी, जहां हर गांव से एक ढोल लाया जाएगा और 12 ढोल एक साथ बजाकर सोए हुए शासन-प्रशासन को जगाने की कोशिश की जाएगी।

ग्रामीणों का आक्रोश मुख्य रूप से मेवाड़ और कलड़वास औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले उस केमिकल युक्त पानी को लेकर है, जिसे बिना किसी उपचार के सीधे नदी में बहाया जा रहा है। यह दूषित पानी न केवल आयड़ नदी को काला कर रहा है, बल्कि प्रसिद्ध उदयसागर तालाब को भी एक विशाल ‘सेफ्टी टैंक’ में बदल चुका है। इस प्रदूषण का सीधा प्रहार क्षेत्र की कृषि और पशुपालन पर पड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में जहरीले पानी के रिसाव से भूमिगत जल का स्तर पूरी तरह प्रदूषित हो गया है, जिससे कुओं और हैंडपंपों का पानी अब पीने लायक नहीं रहा। खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं और इस पानी को पीने से मवेशी बीमार पड़ रहे हैं, जिससे किसानों की कमर टूट गई है।

कानपुर के पूर्व उप सरपंच मदनलाल डांगी और संघर्ष समिति के संयोजक विष्णु पटेल ने चेतावनी दी है कि मनवाखेड़ा, मादड़ी, कलड़वास, खेड़ा, कानपुर, भोईयों की पंचोली, मटून, खरबड़िया, लकड़वास और टीला खेड़ा जैसे गांवों की जनता अब चुप नहीं बैठेगी। क्षेत्र में जल-जनित बीमारियों और चर्म रोगों का प्रकोप तेजी से फैल रहा है, जिसे देखते हुए साधु-संतों और जनप्रतिनिधियों ने भी इस लड़ाई में ग्रामीणों का साथ देने का फैसला किया है। बार-बार प्रशासन को ज्ञापन देने के बावजूद जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अब ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का रास्ता चुना है। यह आंदोलन केवल एक प्रदर्शन नहीं बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और अपनी आजीविका को बचाने की एक आखिरी पुकार है।

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