आदिवासी क्षेत्रों में विकास का रास्ता साफ, TSP एरिया में नगर पालिका बनाने को हाईकोर्ट की हरी झंडी, कोर्ट ने लागू किया ‘हाइब्रिड मॉडल’

बलीचा और ऋषभदेव सहित 14 गांवों को राहत, संसद का कानून आने तक चलेगी मिश्रित व्यवस्था; कोर्ट ने आदिवासियों की जमीन छिनने के डर वाली याचिकाएं खारिज कीं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर और बांसवाड़ा के टीएसपी (Scheduled Areas/TSP) क्षेत्रों के विकास को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इन क्षेत्रों में नगर पालिकाओं के गठन और विस्तार के लिए उन गांवों को शामिल करने की राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया है, जिसे पहले संवैधानिक आधार पर चुनौती दी गई थी। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने बलीचा ग्राम पंचायत और अन्य की ओर से दायर कुल 14 याचिकाओं को खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि टीएसपी क्षेत्रों में नगर पालिका अधिनियम लागू करने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है।

अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि जब तक संसद से ‘मेसा’ (MESA – म्युनिसिपैलिटी एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया) कानून नहीं बन जाता, तब तक इन क्षेत्रों में प्रशासन ‘हाइब्रिड गवर्नेंस मॉडल’ यानी मिश्रित व्यवस्था के तहत चलेगा। दरअसल, राज्य सरकार ने उदयपुर के बलीचा, ऋषभदेव, सेमारी और बांसवाड़ा के घाटोल व परतापुर सहित कई प्रमुख गांवों को नगर पालिका क्षेत्र घोषित किया था। इस फैसले के खिलाफ बलीचा की सरपंच लक्ष्मी बाई गमेती सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 243-ZC के तहत टीएसपी क्षेत्रों में सीधे नगर पालिका कानून लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके लिए संसद ने ‘पेसा एक्ट’ की तरह कोई विशेष कानून नहीं बनाया है। याचिकाकर्ताओं को डर था कि नगर पालिका बनने से आदिवासियों की जमीनें छिन जाएंगी और पेसा एक्ट के अधिकारों का उल्लंघन होगा। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को दरकिनार करते हुए राज्य सरकार की अधिसूचना को वैध माना है। अब इस फैसले के बाद इन क्षेत्रों में शहरी बुनियादी ढांचे और नागरिक सुविधाओं के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

क्या है ‘हाइब्रिड मॉडल’?

चूंकि अभी तक केंद्र सरकार ने TSP क्षेत्रों में नगर पालिकाओं के लिए MESA कानून नहीं बनाया है, इसलिए हाईकोर्ट ने एक विशेष व्यवस्था (Hybrid Framework) दी है:

  • शहरी सुविधाएं: सड़क, सफाई, रोशनी, निर्माण और टैक्स जैसे मामले ‘राजस्थान म्युनिसिपैलिटी एक्ट, 2009’ के तहत चलेंगे।
  • आदिवासी अधिकार: जमीन, संस्कृति, जंगल और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में संविधान की 5वीं अनुसूची ही सर्वोच्च रहेगी। यानी नगर पालिका बनने के बाद भी आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
  • PESA की भूमिका: सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पुरानी PESA (पेसा) संस्थाएं और ग्राम सभाएं खत्म नहीं होंगी। वे एक ‘सलाहकार’ की भूमिका में काम करती रहेंगी ताकि आदिवासियों के हितों की रक्षा हो सके।
Spread the love