
कोख में पल रही नन्ही जान के अस्तित्व और उसकी सांसों पर चंद रुपयों की भूख किस कदर हावी हो चुकी है, इसका एक रूह कंपा देने वाला और काला सच राजस्थान-हरियाणा की सरहद पर उजागर हुआ है। कोटपूतली-बहरोड़ के शांत इलाकों की आड़ में चल रहा यह घिनौना कारोबार न केवल देश के सख्त कानूनों को सरेआम चुनौती दे रहा था, बल्कि ‘बेटी बचाओ’ के उस पवित्र संकल्प की जड़ों में भी तेजाब डालने का काम कर रहा था, जिसे समाज बरसों से सींचने की कोशिश कर रहा है। महज अस्सी हजार रुपयों की चंद गड्डियों के खातिर कुछ सफेदपोश दरिंदों ने खुद को विधाता समझ लिया था और यह तय करने की खौफनाक मंडी सजा रखी थी कि किसे इस दुनिया की रोशनी देखनी चाहिए और किसे कोख के अंधेरे में ही खामोश कर देना चाहिए।
नारनौल पीसीपीएनडीटी टीम की सतर्कता ने जब इस मकड़जाल की परतों को उधेड़ा, तो तकनीक और आधुनिकता के दुरुपयोग का एक बेहद पेशेवर और डरावना चेहरा सामने आया। इस गिरोह ने पकड़े जाने के डर से बचने के लिए वाट्सएप कॉल, गुप्त लोकेशनों और किश्तों में डिजिटल भुगतान का सहारा लिया था, मानो वे किसी मासूम की जिंदगी का नहीं बल्कि किसी बेजान वस्तु का सौदा कर रहे हों। एक डिकोय महिला के जरिए जब इस तंत्र की थाह ली गई, तो रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत सामने आई कि कैसे इन सौदागरों ने गर्भवती महिलाओं को एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमाओं में पार कराने के लिए गुप्त रास्तों और निजी वाहनों का एक पूरा नेटवर्क तैयार कर रखा था। कोटपूतली के मोहल्ला बड़ाबास के एक बंद मकान में, जहां जीवन को सहेजने की उम्मीद होनी चाहिए थी, वहां पोर्टेबल मशीनों के जरिए कुदरत के सबसे अनमोल उपहार के खिलाफ साजिश रची जा रही थी।
दबिश के दौरान जब्त की गई आलीशान गाड़ियां, मोबाइल फोन में दर्ज वह ठंडी बातचीत और खून से सने पैसों का डिजिटल हिसाब इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इंसानियत का पतन किस गहराई तक हो चुका है। पकड़े गए छह चेहरों के पीछे छिपी वह हिंसक और संकीर्ण सोच समाज के लिए किसी महामारी से कम नहीं है, जो बेटियों को बोझ समझकर उन्हें जन्म लेने से पहले ही मिटा देने को एक मुनाफे वाला व्यापार मानती है। हालांकि आज ये गुनहगार सलाखों के पीछे अपनी नियति का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यह पूरी घटना हमारे सभ्य होने के दावों पर एक करारा तमाचा है। यह कांड चीख-चीख कर कह रहा है कि जब तक समाज के भीतर छिपी इस पितृसत्तात्मक और संवेदनहीन मानसिकता का अंत नहीं होगा, तब तक न जाने कितनी मासूम कलियां खिलने से पहले ही मसल दी जाती रहेंगी। यह सिर्फ एक गिरोह का पर्दाफाश नहीं है, बल्कि उस मरती हुई नैतिकता की अंतिम चेतावनी है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम विकास की अंधी दौड़ में अपनी संवेदनाएं कहां पीछे छोड़ आए हैं।
