राजस्थान में बजने वाला है पंचायतीराज चुनावों का बिगुल, मार्च में थमेगा इंतजार

जयपुर। राजस्थान की सियासत में अब गांव की सरकार को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। प्रदेश में लंबे समय से अटके पंचायतीराज चुनावों का इंतजार अब खत्म होने की कगार पर है। राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी कमर कस ली है और संकेत मिल रहे हैं कि मार्च के महीने में वार्ड पंचों से लेकर सरपंचों तक के भाग्य का फैसला जनता करेगी। इस चुनावी महाकुंभ का आगाज 25 फरवरी के बाद कभी भी हो सकता है, क्योंकि इसी दिन फाइनल वोटर लिस्ट का प्रकाशन होना है। माना जा रहा है कि फरवरी के आखिरी दिनों या मार्च के पहले हफ्ते में चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो जाएगी।

इस बार का चुनाव राजस्थान के लोकतांत्रिक इतिहास में बेहद खास और विशाल होने जा रहा है। सूबे में नई ग्राम पंचायतों के गठन के बाद अब सरपंचों के 14,635 पदों पर मुकाबला होगा, वहीं 1 लाख से भी ज्यादा वार्ड पंच चुने जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि इस बार पंच और सरपंच के चुनाव के लिए पुरानी परंपरा यानी बैलेट पेपर का सहारा लिया जाएगा, जबकि जिला परिषद और पंचायत समिति के सदस्यों के लिए ईवीएम मशीनें तैनात रहेंगी। आयोग ने कलेक्टरों को पहले ही मतपत्रों के जरिए चुनाव संपन्न कराने के निर्देश भेज दिए हैं।

सियासी गलियारों में इन चुनावों को लेकर पहले से ही काफी तकरार देखने को मिली है। विपक्षी कांग्रेस लगातार भाजपा सरकार पर चुनाव टालने के आरोप लगाती रही है, वहीं सरकार ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ के फॉर्मूले पर विचार कर रही थी। हालांकि, संवैधानिक बाध्यताओं और सुप्रीम कोर्ट की अप्रैल तक चुनाव कराने की सख्ती के बाद अब सरकार और प्रशासन के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। चुनाव में हुई इस देरी का खामियाजा प्रदेश को आर्थिक मोर्चे पर भी भुगतना पड़ा है, जहां करीब 3000 करोड़ रुपये का केंद्रीय फंड सिर्फ इसलिए अटक गया क्योंकि पंचायतों में निर्वाचित जनप्रतिनिधि मौजूद नहीं थे। अब जब मार्च में चुनाव की बिसात बिछने वाली है, तो उम्मीद जताई जा रही है कि न केवल गांवों को नई सरकार मिलेगी, बल्कि विकास कार्यों के लिए रुका हुआ पैसा भी राजस्थान की झोली में आएगा।

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