बारूद के धमाकों से दहला मेनार: 451 साल पुरानी शौर्य गाथा ने जीवंत किया मुगलों पर जीत का इतिहास

उदयपुर। झीलों की नगरी के समीप स्थित मेनार गांव बुधवार की काली रात को बारूद की रोशनी से नहा उठा। हवा में गूंजते तोपों के धमाके, बंदूकों से निकलती चिंगारियां और टकराती तलवारों की खनक ने 451 साल पहले के उस रणक्षेत्र की याद दिला दी, जब मेवाड़ी वीरों ने मुगल चौकी को नेस्तनाबूद किया था। उदयपुर-चित्तौड़गढ़ हाईवे पर स्थित इस गांव में जमरा बीज के अवसर पर आयोजित ‘बारूद की होली’ ने इस बार भी न केवल राजस्थान बल्कि सात समंदर पार तक अपनी धमक सुनाई।

लाल कसुमल पगड़ियों और पारंपरिक युद्धक वेशभूषा में सजे मेनारिया ब्राह्मण समाज के युवाओं और बुजुर्गों का जोश देखते ही बन रहा था। रात के सन्नाटे को चीरते हुए जब पांच रास्तों की मोर्चाबंदी के लिए मशालें निकलीं, तो पूरा गांव जयकारों से गूंज उठा। ओंकारेश्वर चौक पर जब विजय का शंखनाद हुआ, तो एक साथ उगलती तोपों और हवाई फायर ने आसमान को धुआं-धुआं कर दिया। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि स्वाभिमान की वो विरासत है जिसे यह समाज पीढ़ी दर पीढ़ी अपने सीने से लगाए बैठा है।

इस ऐतिहासिक आयोजन की शुरुआत दोपहर में शाही जाजम बिछाकर की गई, जहां समाज के पंच-पटेलों और बुजुर्गों का पारंपरिक रीति-रिवाजों से स्वागत हुआ। जैसे-जैसे सूरज ढला, गांव की गलियां छावनी में तब्दील हो गईं। महिलाएं सिर पर मंगल कलश लिए वीर रस के गीत गाती रहीं, तो दूसरी ओर पुरुष तलवारों के साथ गैर नृत्य कर अपने पूर्वजों के पराक्रम को दोहराते नजर आए। बोचरी माता की घाटी पर जब जीत की शौर्य गाथा पढ़ी गई, तो हर किसी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

हैरानी की बात यह है कि इस बारूद के खेल में उम्र की कोई सीमा नहीं दिखी। जो युवा दुबई और मुंबई में बड़े शेफ के तौर पर नाम कमा रहे हैं, वे अपनी मिट्टी की पुकार पर गांव पहुंचे और हाथों में तलवारें थाम लीं। हालांकि इजरायल-ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण उड़ानों की समस्या ने कुछ प्रवासियों के कदमों को जरूर रोका, लेकिन फिर भी गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से आए हजारों पर्यटकों ने एक किलोमीटर पैदल चलकर इस हैरतअंगेज नजारे का लुत्फ उठाया। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में अब मेनार की यह ‘खूनी’ नहीं बल्कि ‘वीरता की होली’ वैश्विक पटल पर अपनी पहचान पुख्ता कर चुकी है।

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