
राजस्थान की भजनलाल सरकार का ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ वाला महात्वाकांक्षी दांव पहली ही बार में कानूनी और प्रशासनिक जाल में उलझता नजर आ रहा है। 2026 में प्रदेश के नगरीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव एक साथ कराने का सपना फिलहाल अधूरा रहने वाला है। इस पूरे सियासी ड्रामे के पीछे सबसे बड़ा रोड़ा बना है 25 बनाम 16 जिलों का पेच और 2162 वार्डों का उलझा हुआ सीमांकन। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नगरीय निकायों में वार्डों की संख्या 10245 से घटाकर फिर से 8.5 हजार के करीब लानी होगी, जिसके बिना चुनाव कराना मुमकिन नहीं दिख रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि 113 निकायों के चुनाव पर पहले से ही हाईकोर्ट का स्टे लगा हुआ है, जिसने सरकार की टेंशन बढ़ा दी है। दूसरी तरफ, पंचायती राज संस्थाओं का गणित भी पूरी तरह बिगड़ चुका है। प्रदेश के 16 जिलों में जिला परिषद और पंचायत समिति के बोर्ड का कार्यकाल अभी करीब 8 महीने बाकी है, जिन्हें भंग करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। अगर सरकार इन बोर्ड को जबरन भंग करती है, तो जनप्रतिनिधियों के कोर्ट जाने का डर है, जिससे ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ का पूरा फार्मूला ही अधर में लटक सकता है। हालांकि, झालावाड़, झुंझुनूं और उदयपुर समेत करीब 25 जिलों में कार्यकाल पूरा होने के कारण चुनाव की राह आसान है, लेकिन कोटा, बारां और करौली जैसे जिले इस राह में बड़ी बाधा बनकर खड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के सख्त आदेश दे रखे हैं, जबकि सरकार की मंशा मई या जून तक का वक्त लेने की है ताकि कोर्ट से स्टे हटवाकर एक साथ वोटिंग कराई जा सके। राज्य निर्वाचन आयोग ने भी सरकार से इस पूरे कन्फ्यूजन पर स्पष्टीकरण मांगा है, लेकिन मंत्रियों की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब नहीं आया है। सरकारी वकील और रणनीतिकार अब इस कानूनी भूलभुलैया से निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। कुल मिलाकर, राजस्थान की राजनीति में ‘एक राज्य, एक चुनाव’ का यह फार्मूला फिलहाल फाइलों और कोर्ट की तारीखों के बीच झूलता दिखाई दे रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर सियासी घमासान और तेज हो गया है।
