AIIMS और जड़ी-बूटी के ‘गुणीजन’ मिलाएंगे हाथ, आदिवासी इलाकों के लिए सरकार का मास्टर प्लान

उदयपुर। राजस्थान के सुदूर और दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की दिशा में सरकार ने एक बेहद अनूठी और क्रांतिकारी पहल की है। अक्सर देखा गया है कि घने जंगलों या पहाड़ी इलाकों में रहने वाले ग्रामीण अस्पताल जाने के बजाय अपने स्थानीय ‘जनजाति गुणीजनों’ यानी जड़ी-बूटियों के जानकारों पर अधिक भरोसा करते हैं। इसी जमीनी हकीकत को समझते हुए अब सरकार इन गुणीजनों को ही स्वास्थ्य व्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ने जा रही है।

इस विशेष योजना के तहत जड़ी-बूटियों से इलाज करने वाले इन जानकारों को ‘मास्टर ट्रेनर’ के रूप में तैयार किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर इलाज करने के बजाय मरीज और एम्स जैसे बड़े संस्थानों के बीच एक मजबूत कड़ी का काम करेंगे। इस पूरे प्रोजेक्ट के संचालन के लिए एम्स जोधपुर ने सिरोही के आबू रोड स्थित सैटेलाइट ट्राइबल सेंटर के माध्यम से टेलीमेडिसिन की सुविधा मुहैया कराने का जिम्मा संभाला है। वर्तमान में प्रदेश के 18 अनुभवी गुणीजनों को मास्टर ट्रेनर के तौर पर प्रशिक्षित किया जा चुका है और आने वाले समय में इनकी संख्या में और इजाफा किया जाएगा।

योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि जब भी कोई बीमार व्यक्ति इन स्थानीय जानकारों के पास पहुंचेगा, तो वे तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सीधे एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टरों से उनकी बात कराएंगे। एम्स जोधपुर के डॉ. प्रदीप द्विवेदी ने इस पहल को देश का पहला ऐसा अनूठा प्रयोग बताया है, जहाँ आधुनिक तकनीक और पारंपरिक विश्वास को एक साथ लाया गया है। प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि इन जानकारों के काम में हस्तक्षेप करने या उन्हें टोकने के बजाय, उन्हें अपनी चर्चाओं का हिस्सा बनाया जाएगा ताकि आदिवासी अंचल का कोई भी व्यक्ति विशेषज्ञ चिकित्सा सलाह से वंचित न रहे। इस कदम से न केवल गंभीर मरीजों को समय पर सही उपचार मिल सकेगा, बल्कि दुर्गम क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी आसान हो जाएगी।

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