
राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद उनकी तस्वीरें आधे कपड़ों अंडरगारमेंट्स में खींचकर सोशल मीडिया में शेयर करने की ‘फोटो-ऑप संस्कृति’ पर सख्त रुख अपनाया है। जोधपुर मुख्य पीठ के जस्टिस फरजंद अली ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा- “एक आरोपी केवल आरोपी होता है, दोषी नहीं।”
कोर्ट ने पुलिस की इस कार्यप्रणाली को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लोगों को मिले ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ पर सीधा और गंभीर हमला बताया है।
कोर्ट ने कहा- किसी भी व्यक्ति को, चाहे उस पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, थाने के गेट पर बैठाकर उसकी नुमाइश करना और उसे दुनियाभर में अपराधी की तरह पेश करना कानूनन जुर्म है। कोर्ट ने 20 जनवरी मंगलवार को दिए इस आदेश में जैसलमेर एसपी और जोधपुर पुलिस कमिश्नर को सोशल मीडिया से ऐसी सभी तस्वीरें 24 घंटे में हटाने के सख्त निर्देश दिए।यह मामला जैसलमेर के बसनपीर जूनी इलाके से जुड़ा है। यहां के निवासी इस्लाम खान और 9 अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिट याचिका दायर कर पुलिस की अपमानजनक प्रथा को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं में इस्लाम खान के अलावा बे खान, सुभान खान, रणे खान, बसीर खान, जाकर खान और चार महिलाएं हसीयत, तीजा, हुरा और जमा शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं के वकील सरवर खान, रज्जाक खान और देवकीनंदन व्यास ने कोर्ट को बताया- जैसलमेर पुलिस ने अघोषित नियम बना लिया है। जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे पुलिस थाने के गेट के पास पर जमीन पर बैठाया जाता है। इसके बाद उनकी तस्वीरें आधे कपड़ों में व्हॉट्सऐप ग्रुप्स, फेसबुक में ‘सफलता की कहानी’ के रूप में शेयर की जाती है।
