
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 सितंबर को बांसवाड़ा आएंगें। वे यहां राजस्थान-मध्यप्रदेश के बॉर्डर पर बन रहे करीब 45 हजार करोड़ की परमाणु ऊर्जा परियोजना का शिलान्यास करेंगे।
हालांकि पीएम के आने से दो दिन पहले भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) सांसद राजकुमार रोत आज(मंगलवार) दोपहर करीब 1 बजे जिला कलेक्ट्रेट पर धरने पर बैठ गए। उन्होंने न्यूक्लियर पावर प्लांट के विस्थापितों की 30 सूत्री मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।
रोत के नेतृत्व में बीएपी के कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम जिला कलेक्टर को ज्ञापन देने पहुंचे। करीब 2 घंटे तक विस्थापित लोगों के साथ जमकर नारेबाजी की।
सांसद राजकुमार रोत ने बताया- कलेक्टर से मुलाकात की है। उन्होंने उनके दायरे में आने वाली कुछ मांगों को लेकर सहमति के लिए आश्वासन दिया है। लेकिन पूरी तरह से मांगें नहीं मानी गई हैं, इसलिए मांगे नहीं मानने तक धरना प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले सभी मांगों को पूरी करने की मांग की है।
रोत बोले- कमल और कांग्रेस एक हैं, दोनों के नेता मिले हुए
सांसद ने धरना स्थल पर कहा- कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों के नेता मिले हुए हैं। दोनों पार्टियों की सरकार में न्यूक्लियर पावर प्लांट की जमीन अधिग्रहण समेत अन्य कार्य हुए हैं। कमल और कांग्रेस एक हैं।
रिएक्टर का पानी माही नदी में नहीं छोड़ा जाए रोत ने कहा कि एनपीसीआईएल कर्मचारियों, अधिकारियों और स्थानीय दलालों ने मिलकर पूरे क्षेत्र में 50 लाख रुपए प्रति बीघा जमीन पर मुआवजा का माहौल बनाकर सौदे किए। फिर मुआवजा वितरण के दौरान 7.68 लाख प्रति बीघा दिया गया। एनपीसीआईएल के आश्वासन अनुरूप मुआवजा दिया जावे।
माही परमाणु बिजलीघर की जारी रिपोर्ट अनुसार रिएक्टर का दूषित पानी माही नदी में छोडने की योजना है, मछली-आखेट पर भी पाबंदी रहेगी। पर्यावरण व स्थानीय जैव विविधता का ध्यान रखते हुए रिएक्टर का दूषित पानी माही नदी में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
विस्थापन में नियमों के उल्लंघन का आरोप
एनपीसीआईएल के द्वारा जारी सीएसआर मद का उपयोग प्रभावित लोगों के लिए नहीं करते हुए अन्य अनावश्यक जगह किया जा रहा है, जैसे बांसवाड़ा जिला मुख्यालय पर खेल स्टेडियम के पास स्विमिंग पुल निर्माण आदि बनाए जा रहे है। ऐसे में CSR मद का उपयोग परमाणु बिजलीघर से विस्थापित प्रभावित परिवारों के लिए ही किया जाना चाहिए।
वहीं परियोजना में जिन परिवारों को विस्थापित किया जा रहा हैं, उनमें से कई परिवार पूर्व में माही बांध बनने से विस्थापित हुए है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जो परिवार अपने जीवनकाल में एक बार विस्थापित हो चुका है, उसे दुबारा विस्थापित नहीं किया जा सकता है, ऐसे में कई परिवार दो बार विस्थापित हो रहे है। यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है। इसकी पूरी जांच हो।
विस्थापितों को पूर्व का मुआवजा भी दिलाने की मांग
माही बांध से विस्थापित हुए मछुआरों के 40 परिवारों को राज्य सरकार ने 50 वर्षों बाद वर्ष 2001 में ग्राम बारी स्थित मछुआरा कॉलोनी में बसाया, जिन्हें पुनः विस्थापित होना पड़ेगा। साथ ही इन्हें पूर्व के माही विस्थापन का मुआवजा आज तक नहीं दिया गया। इसके लेकर यह सभी 2015 में हाईकोर्ट की शरण ले चुके हैं, ऐसे में उन्हें उचित मुआवजा सहित पूर्व का मुआवजा भी दिलवाया जावे।
यह मांगें भी रही प्रमुख
- प्रत्येक बेघर परिवार को 50 लाख रुपए दिये जाये।
- प्रत्येक किसान को जमीन के बदले जमीन दी जावे।
- योजना का विरोध कर रहे लोगों पर लगाए मुकदमों को वापस लिया जाए।
- प्रति गांव के समस्त प्रभावित किसानों को एक ही जगह पर कृषि योग्य भूमि उपलब्ध कराए।
- प्रत्येक परिवार के 18 वर्ष से ऊपर के सदस्य को कंपनी में नौकरी दी जाए।
- प्रत्येक किसान व परिवार के विवाहित पुत्रों की बांसवाड़ा के नगर परिषद परिसर में 1600 वर्गफीट पर मकान बनाकर दिया जावे।
- भूमिहीन किसानों को नौकरी, जमीन व सभी सुविधा उपलब्ध करवाई जावे।
- परमाणु बिजलीघर से उत्पादित मुनाफे की 20 प्रतिशत राशि किसानों को 100 साल तक दी जावें।
- प्रभावित परिवार के सदस्यों को प्रतिमाह राशि 25,000/- रुपए पेंशन दे और प्रतिवर्ष महंगाई भत्ता बढ़ाया जावे।
- प्रभावित 12वीं पास बेरोजगार युवाओं को कम्प्युटर का प्रशिक्षण देकर उन्हें कंपनी में नौकरी दी जाए।
