रहस्यमयी बीमारी से 8 बच्चों की मौत, इलाज में देरी बनी बड़ी वजह

सलूंबर जिले में रहस्यमयी बीमारी ने भयावह रूप ले लिया है। अब तक 8 मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि प्रशासन लगातार घर-घर सर्वे कर सैंपल जुटा रहा है। बीमार बच्चों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है, लेकिन अब तक मौत के असली कारण का खुलासा नहीं हो पाया है।

जमीनी हकीकत इससे भी ज्यादा चिंताजनक है। जिन इलाकों में ये घटनाएं हुईं, वहां न तो मोबाइल नेटवर्क ठीक है और न ही सड़क व्यवस्था। ऐसे में बीमार बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाना परिजनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। कई मामलों में इलाज मिलने में देरी ही मौत का कारण बन रही है।

दो बेटों को खो चुके पिता का दर्द
लालपुरा गांव के मानूराम मीणा ने कुछ ही दिनों में अपने दो बेटों को खो दिया। 4 वर्षीय दीपक की तबीयत रात में अचानक बिगड़ी। पहले धरियावद, फिर प्रतापगढ़ और अंत में उदयपुर रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।

इस सदमे से परिवार उबर भी नहीं पाया था कि 7 वर्षीय लक्ष्मण भी बीमार पड़ गया। उसे भी एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जाता रहा। दो दिन इलाज चला, लेकिन 5 अप्रैल को उसने भी दम तोड़ दिया।

पहचान के अभाव में शिक्षा से दूर बच्चे
मानूराम ने बताया कि बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड नहीं बनने के कारण वे स्कूल तक नहीं जा सके। यह प्रशासनिक लापरवाही का एक और दर्दनाक पहलू सामने लाता है।

इलाज से पहले लंबा सफर, फिर मौत
घाटा गांव के लक्ष्मण मीणा के 4 वर्षीय बेटे राहुल को बुखार और उल्टी हुई। उसे भी एक के बाद एक अस्पतालों में रेफर किया गया—धरियावद, प्रतापगढ़, सलूंबर और अंत में उदयपुर। लेकिन इलाज के दौरान उसकी भी मौत हो गई। परिजन अब प्रशासन से बीमारी का कारण और इलाज खोजने की मांग कर रहे हैं।

सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत बेहद खराब है। लसाड़िया-धरियावाद मार्ग पिछले 10 वर्षों से जर्जर पड़ा है। एंबुलेंस चालक भी कई बार आने से मना कर देते हैं। 35 किलोमीटर के दायरे में कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है।

रिटायर्ड आयुर्वेदिक कंपाउंडर केशव लाल मीणा का कहना है कि खराब सड़कों के कारण मरीजों को अस्पताल पहुंचने में 3 घंटे तक लग जाते हैं। कई बार तो रास्ते में ही महिलाओं की डिलीवरी हो जाती है।

अंधविश्वास भी बना जानलेवा
एक मामले में 2 वर्षीय बच्ची काजल को तेज ऐंठन और उल्टी की शिकायत थी, लेकिन परिजन उसे अस्पताल ले जाने की बजाय भोपा के पास ले गए। इलाज के आश्वासन के बावजूद बच्ची की मौत हो गई।

पोस्टमॉर्टम नहीं, कारण अब भी रहस्य
चौंकाने वाली बात यह है कि किसी भी बच्चे का पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया। जागरूकता की कमी और परिजनों की सहमति न मिलने के कारण मौत का वास्तविक कारण अब भी सामने नहीं आ पाया है।

प्रशासनिक दावे बनाम जमीनी हकीकत
प्रशासन सर्वे और सैंपलिंग का दावा कर रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं की कमी, खराब सड़कें, नेटवर्क की समस्या और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी इस त्रासदी को और गहरा बना रही है।

यह मामला सिर्फ एक बीमारी का नहीं, बल्कि सिस्टम की उन खामियों का है, जो समय पर इलाज न मिलने से मासूम जिंदगियों को छीन रही हैं।

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